क्या सच में न्यूज चैनलों को देखना बंद करना चाहिए ? नहीं कोई जरुरत नहीं |



पत्रकारिता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है | लोकतंत्र को सक्षम करने में पत्रकारिता के माध्यम से उचित विचार रखना अपेक्षित है | राष्ट्र और समाज की समस्याओं को अपनी खुद की समस्या समझकर सत्य के लिए अपनी कलम के माध्यम से लड़ना अपेक्षित है, न की खुद की समस्या को राष्ट्र की समस्या बनाकर पेश करना | मुझे कुछ ऐसा ही प्रतीत हुआ जब मैंने एनडीटीव्ही के पत्रकार रविश कुमार लिखित एक पत्र पढ़ा | जिसमें उन्होंने चैनलों, हिन्दी अखबारों की जमकर आलोचना की| और न्यूज चैनल को न देखने की और हिन्दी अखबार को न पढ़ने की मुफ्त सलाह दे डाली |
आपके पत्र में एक महत्वपूर्ण वाक्य पढ़ा और जिससे मै सहमत भी हू |  सही सूचना और सही सवाल आपकी नागरिकता के लिए जरुरी है | साहब, आजकल यही तो हो रहा है | बहोत से तथ्य और जानकारी अब विस्तृत रूप से, सहजता से मिल रही है | किसी जमाने में जो राज थे वह नहीं रहे |
और क्या इससेही आपको डर लग रहा है ?
क्या भारत के सभी नागरिक इतने मुर्ख है जो किसी न्यूज चैनलों को देखकर किसी नेता को पसंद या नापसंद करे ? अगर कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को पसंद करता है तो उसकी नागरिकता ख़त्म हो जायेगी ? कितनी संकीर्ण सोच है आपकी |  अगर कोई न्यूज चैनल या अखबार सरकार के किसी निर्णय का समर्थन करती है तो क्या वह पत्रकारिता ख़त्म हो जायेगी |
पत्रकारिता तो वही है न जो हमेशा सत्य का पक्ष ले | जो किसी भी दबाव के सामने न झुके | समाज के समस्याओं को आवाज दे और नागरिको के हित में पक्ष लेकर उनका वकील बने | सरकार को भी सवाल पूछे | लेकिन जितना आवश्यक सवाल पूछना है, उतनाही आवश्यक सरकार के अच्छे निर्णयों का समर्थन भी करे | सवाल पूछना यह पत्रकारिता का अस्त्र है | वह पत्रकारिता की आदत न बन जाए | और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है की, कोई पत्रकार, नागरिक किसी तथ्य और जानकारी को सही या गलत ठहराने की क्षमता रखता है | लेकिन आप तो सभी न्यूज चैनल, हिन्दी अख़बारो को भांड साबित करने में लगे है | क्या यह सही पत्रकारिता है ?
माना की आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व पसंद नहीं है | हो सकता है आप किसी विशिष्ट विचारधारा को मानते हो | लेकिन इसका मतलब यह नहीं है की आप अपनी पसंद या नापसंद  लोकतंत्र की दुहाई देकर जनता पर थोपे | एक जिम्मेदार पत्रकार पत्रकारिता का ऐसा दुरुपयोग कभी भी नहीं करता |       
साहब, लोकतंत्र का बर्बाद होना , पत्रकारिता का पतन होना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के किसी समर्थक को भक्त कहने जितना आसान थोड़ी ना है | पत्रकारिता का एक जिम्मेवार छात्र होने के नाते यही कहना चाहूंगा की किसी भी हिन्दी अखबार ने पाठको की हत्या करने की सुपारी नहीं ली है | यह तो आपका डर है की कही आपके नापसंद नेता को जनता पसंद करने लगे |
कितनी शर्मनाक बात है जब आप कहते है की, पाकिस्तान के साथ तनाव निर्माण करना न्यूज चैनलों की फितरत है | क्या आप ऐसा नहीं कह सकते थे की,भारत के साथ तनाव निर्माण करना पाकिस्तान की फितरत है | क्या पुलवामा आतंकी हमला न्यूज चैनलों ने करवाया? और जब हमारे ४५ जवान मारे जाते है तो क्या उस  विषय पर न्यूज चैनलों और अखबारों ने चर्चा नहीं करनी चाहिए ? सिर्फ एक न्यूज देकर चुप हो जाना सही पत्रकारिता है ?        
अगर आपके लिए यही पत्रकारिता है, उन्माद संसार है तो वास्तव में यह आपका पतन है ? समूची पत्रकारिता का नही |
पहले तो आप पत्रकारिता के पतन होने की घोषणा करते है और उसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को अभिभावक ठहराते हुए अपनी भड़ास निकालते है | जनता के सामने तथ्य और सही जानकारी रखना, किसी निर्णय की सराहना करना यह पतन नही है| लेकिन जब आपको लगता है की जो मुझे पसंद हो वही तथ्य और जानकारी रखना पत्रकारिता है, तो वह निश्चित रुप से पत्रकारिता के पतन है | और रही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को अभिभावक ठहराने की, ऐसा लगता है मानो आपने विपक्षी दलों से सुपारी ली हो | अगर ऐसा है तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं | लेकिन इसमे पत्रकारिता, लोकतंत्र, नागरिकता को मत घसीटिए |
साहब, राष्ट्रभक्ती का मौक़ा नहीं दिया जाता | वो तो हृदय में निहित होती है | नागरिको में राष्ट्रभक्ती है इसलिए तो ४५ जवानो की शहादत का जवाब देने की माँग कर रहे है| और जो मौकापरस्त राष्ट्रभक्त रहते है, उनमें मौक़ा देकर भी राष्ट्रभक्ती पैदा नहीं होती |
और अंत में जो बात आपने कही थी उसीको दोहराता हू | साहब एक नेता के विरोध का समर्थन निश्चितरूप से पत्रकारिता के पतन का समर्थन है | और पत्रकारिता के इतिहास में आपके नाम का काला पन्ना होगा जैसे की आपने स्क्रीन ब्लेक आउट किया था |
         
    


     


Post a Comment

0 Comments