क्या सच में न्यूज चैनलों को देखना बंद करना चाहिए ? नहीं कोई जरुरत नहीं | - दर्पण

Tuesday, March 5, 2019

क्या सच में न्यूज चैनलों को देखना बंद करना चाहिए ? नहीं कोई जरुरत नहीं |



पत्रकारिता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है | लोकतंत्र को सक्षम करने में पत्रकारिता के माध्यम से उचित विचार रखना अपेक्षित है | राष्ट्र और समाज की समस्याओं को अपनी खुद की समस्या समझकर सत्य के लिए अपनी कलम के माध्यम से लड़ना अपेक्षित है, न की खुद की समस्या को राष्ट्र की समस्या बनाकर पेश करना | मुझे कुछ ऐसा ही प्रतीत हुआ जब मैंने एनडीटीव्ही के पत्रकार रविश कुमार लिखित एक पत्र पढ़ा | जिसमें उन्होंने चैनलों, हिन्दी अखबारों की जमकर आलोचना की| और न्यूज चैनल को न देखने की और हिन्दी अखबार को न पढ़ने की मुफ्त सलाह दे डाली |
आपके पत्र में एक महत्वपूर्ण वाक्य पढ़ा और जिससे मै सहमत भी हू |  सही सूचना और सही सवाल आपकी नागरिकता के लिए जरुरी है | साहब, आजकल यही तो हो रहा है | बहोत से तथ्य और जानकारी अब विस्तृत रूप से, सहजता से मिल रही है | किसी जमाने में जो राज थे वह नहीं रहे |
और क्या इससेही आपको डर लग रहा है ?
क्या भारत के सभी नागरिक इतने मुर्ख है जो किसी न्यूज चैनलों को देखकर किसी नेता को पसंद या नापसंद करे ? अगर कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को पसंद करता है तो उसकी नागरिकता ख़त्म हो जायेगी ? कितनी संकीर्ण सोच है आपकी |  अगर कोई न्यूज चैनल या अखबार सरकार के किसी निर्णय का समर्थन करती है तो क्या वह पत्रकारिता ख़त्म हो जायेगी |
पत्रकारिता तो वही है न जो हमेशा सत्य का पक्ष ले | जो किसी भी दबाव के सामने न झुके | समाज के समस्याओं को आवाज दे और नागरिको के हित में पक्ष लेकर उनका वकील बने | सरकार को भी सवाल पूछे | लेकिन जितना आवश्यक सवाल पूछना है, उतनाही आवश्यक सरकार के अच्छे निर्णयों का समर्थन भी करे | सवाल पूछना यह पत्रकारिता का अस्त्र है | वह पत्रकारिता की आदत न बन जाए | और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है की, कोई पत्रकार, नागरिक किसी तथ्य और जानकारी को सही या गलत ठहराने की क्षमता रखता है | लेकिन आप तो सभी न्यूज चैनल, हिन्दी अख़बारो को भांड साबित करने में लगे है | क्या यह सही पत्रकारिता है ?
माना की आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व पसंद नहीं है | हो सकता है आप किसी विशिष्ट विचारधारा को मानते हो | लेकिन इसका मतलब यह नहीं है की आप अपनी पसंद या नापसंद  लोकतंत्र की दुहाई देकर जनता पर थोपे | एक जिम्मेदार पत्रकार पत्रकारिता का ऐसा दुरुपयोग कभी भी नहीं करता |       
साहब, लोकतंत्र का बर्बाद होना , पत्रकारिता का पतन होना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के किसी समर्थक को भक्त कहने जितना आसान थोड़ी ना है | पत्रकारिता का एक जिम्मेवार छात्र होने के नाते यही कहना चाहूंगा की किसी भी हिन्दी अखबार ने पाठको की हत्या करने की सुपारी नहीं ली है | यह तो आपका डर है की कही आपके नापसंद नेता को जनता पसंद करने लगे |
कितनी शर्मनाक बात है जब आप कहते है की, पाकिस्तान के साथ तनाव निर्माण करना न्यूज चैनलों की फितरत है | क्या आप ऐसा नहीं कह सकते थे की,भारत के साथ तनाव निर्माण करना पाकिस्तान की फितरत है | क्या पुलवामा आतंकी हमला न्यूज चैनलों ने करवाया? और जब हमारे ४५ जवान मारे जाते है तो क्या उस  विषय पर न्यूज चैनलों और अखबारों ने चर्चा नहीं करनी चाहिए ? सिर्फ एक न्यूज देकर चुप हो जाना सही पत्रकारिता है ?        
अगर आपके लिए यही पत्रकारिता है, उन्माद संसार है तो वास्तव में यह आपका पतन है ? समूची पत्रकारिता का नही |
पहले तो आप पत्रकारिता के पतन होने की घोषणा करते है और उसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को अभिभावक ठहराते हुए अपनी भड़ास निकालते है | जनता के सामने तथ्य और सही जानकारी रखना, किसी निर्णय की सराहना करना यह पतन नही है| लेकिन जब आपको लगता है की जो मुझे पसंद हो वही तथ्य और जानकारी रखना पत्रकारिता है, तो वह निश्चित रुप से पत्रकारिता के पतन है | और रही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को अभिभावक ठहराने की, ऐसा लगता है मानो आपने विपक्षी दलों से सुपारी ली हो | अगर ऐसा है तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं | लेकिन इसमे पत्रकारिता, लोकतंत्र, नागरिकता को मत घसीटिए |
साहब, राष्ट्रभक्ती का मौक़ा नहीं दिया जाता | वो तो हृदय में निहित होती है | नागरिको में राष्ट्रभक्ती है इसलिए तो ४५ जवानो की शहादत का जवाब देने की माँग कर रहे है| और जो मौकापरस्त राष्ट्रभक्त रहते है, उनमें मौक़ा देकर भी राष्ट्रभक्ती पैदा नहीं होती |
और अंत में जो बात आपने कही थी उसीको दोहराता हू | साहब एक नेता के विरोध का समर्थन निश्चितरूप से पत्रकारिता के पतन का समर्थन है | और पत्रकारिता के इतिहास में आपके नाम का काला पन्ना होगा जैसे की आपने स्क्रीन ब्लेक आउट किया था |
         
    


     


1 comment:

प्रसन्न खरात. said...

या देशातील पत्रकारांविरुद्ध जनतेने आंदोलन करायची वेळ आली आहे। एकाच पक्षाचे पाय चाटण्यात किती मग्न आहेत दिल्लीतील जनतेने आम आदमी पार्टीला निवडून दिल्यानंतर अख्ख्या दिल्लीला देशद्रोही ठरवणारे, सरकार विरोधात कोणीही आंदोलन केले की त्याला नक्षलवादी ठरवणारे पत्रकार जनतेशी द्रोह करत आहेत। कोणत्याही विवेकी माणसाला राग येईल इतका खाली पत्रकारितेचा स्तर पडला आहे(रिया,सुशांत) तो आपणास दिसत नाही काय? या महाराष्ट्रात एकेकाळी लोकमान्य टिळकांनी वृत्तपत्र चालवले होते परक्यांची राजवट असताना देखील त्यांनी सरकारचे डोके ठिकाणावर आहे का? असे विचारले होते आज जर टिळक असते तर त्यांनी या आजच्या शेपूट घातलेल्या पत्रकारांना पाहून मीडियाचे डोके ठिकाणावर आहे का हे विचारले असते.